भूपेंद्र हुड्डा शैलजा को अध्यक्ष बनाने की फिराक में 
कुलदीप के पास होगी कार्यकारी अध्यक्ष बनने की मजबूरी
कुलदीप श्योराण 
चंडीगढ़। प्रदेश कांग्रेस में चल रही चौधर की मारामारी के बीच कुलदीप बिश्नोई के एक बार फिर धोखे का शिकार बनते नजर आ रहे हैं। पूर्व सीएम भूपेंद्र हुड्डा वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर को हटाकर कुलदीप बिश्नोई की जगह कुमारी शैलजा को प्रदेश अध्यक्ष बनाने की फिराक में हैं। अगर ऐसा है तो कुलदीप बिश्नोई के प्रदेश अध्यक्ष बनने के अरमानों पर पानी फिर जाएगा और उनको किसी छोटे पद पर ही अडजैस्ट होने को मजबूर होना पड़ेगा।
 यह जगजाहिर है कि भछपेंद्र हुड्डा अशोक तंवर को हर हाल में हटाने के लिए पूरी ताकत लगा रहे हैं।वह खुद तो प्रदेश अध्यक्ष बनने में राहुल गांधी की रजामंदी लेने में नाकाम हो रहे हैं लेकिन इसके बदले में वे अशोक तंवर को हटाकर किसी दूसरे नेता को प्रदेश अध्यक्ष बनाने की सहमति देने को तैयार हो गए हैं । इनेलो और बसपा के गठबंधन से पहले भूपेंद्र हुड्डा कुलदीप बिश्नोई को प्रदेश अध्यक्ष बनाने के लिए राजी हो गए थे मगर अब बदले सियासी हालात में कांग्रेस हाईकमान भी दलित नेता को ही प्रदेश अध्यक्ष बनाएं रखना चाहता है जिसके चलते कुलदीप बिश्नोई का पत्ता कट गया है और उनकी जगह भूपेंद्र हुड्डा कुमारी शैलजा को अध्यक्ष पद के लिए आगे कर रहे हैं ।
कुलदीप बिश्नोई ने अध्यक्ष बनने के लिए ही भूपेंद्र हुड्डा के साथ कट्टर दुश्मनी को दोस्ती में बदला था लेकिन उनकी तकदीर एक बार फिर उनको दगा देती दिख रही है।
 प्रदेश कांग्रेस के उलझे समीकरणों के यह दास्तान जनवरी 2014 से शुरू होती है जब राहुल गांधी को खुश करने के लिए भूपेंद्र हुड्डा ने अशोक तंवर को प्रदेश अध्यक्ष बनाने पर रजामंदी दी थी। उस समय भूपेंद्र हुड्डा की कांग्रेस में तूती बोलती थी और उनकी मर्जी के बगैर पत्ता भी नहीं हिलता था।
 भूपेंद्र हुड्डा ने यह सोचा था कि फूलचंद मुलाना की तरह अशोक तवर भी उनकी हाजरी की राजनीति करेंगे और उनकी हां में हां मिलाते हुए उनके हर हुक्म का पालन करेंगे। अशोक तंवर ने शुरू के चार -पांच महीने भूपेंद्र हुड्डा के साथ मेलजोल की राजनीति करने का प्रयास किया लेकिन जब उनको यह महसूस हो गया कि उनको प्रदेश अध्यक्ष की इज्जत और पावर देने की बजाय उनको इस्तेमाल किया जा रहा है तो उन्होंने दूरी बनाने आरंभ कर दी।
 भूपेंद्र हुड्डा के इशारे पर लोकसभा चुनाव में उनके खेमे के किसी भी नेता ने सिरसा संसदीय सीट पर अशोक तंवर की चुनाव में मदद नहीं की जिसके चलते अशोक तंवर अभिमन्यु की तरह अकेले चुनावी जंग लड़ते हुए हार का शिकार हो गए। उसके बाद हुड्डा और तंवर में संबंध खट्टे हो गए जो अक्टूबर 2014 के विधानसभा चुनाव में और भी तनावपूर्ण हो गए ।अशोक तंवर मेरिट के आधार पर नेताओं को टिकट देने के पक्ष में थे मगर भूपेंद्र हुड्डा ने अपनी मनमानी चलाते हुए अपने हिसाब से टिकट बांटी जिसके कारण अशोक तंवर पूरी तरह से उनके खिलाफ हो गए। विधानसभा चुनाव में भूपेंद्र हुड्डा को पार्टी ने सीएम प्रोजेक्ट किया था लेकिन उनकी अगुवाई में कांग्रेस की शर्मनाक हार हुई जिसके कारण भूपेंद्र हुड्डा का सियासी कद भी अर्श से फर्श पर आ गिरा।
 2015 में भूपेंद्र हुड्डा ने सत्ता चली जाने के बाद पार्टी की सत्ता को अपने हाथ में लेने के प्रयास आरंभ कर दिए। उनको उम्मीद थी कि जनार्दन द्विवेदी, रॉबर्ट वाड्रा, अहमद पटेल और शकील अहमद के बलबूते पर वे अशोक तंवर को अध्यक्ष पद से हटाकर खुद अध्यक्ष पद पर विराजमान हो जाएंगे लेकिन उनकी यह हसरत राहुल गांधी की मनाही के कारण पूरी नहीं हो पाई।
 भूपेंद्र हुड्डा ने तमाम कांग्रेसी नेताओं को अशोक तंवर के साथ सहयोग करने से इनकार कर दिया जिसके कारण अशोक तंवर अपने चंद साथियों के साथ प्रदेश कांग्रेस की जिम्मेदारियों को निभाते रहे।
 2016 में भी भूपेंद्र हुड्डा अशोक तंवर को हटाने के लिए हर हथकंडे अपनाते रहे लेकिन वह अशोक तंवर को हटाने के लिए राहुल गांधी को मनाने में नाकाम रहे। भूपेंद्र हुड्डा ने हाई कमान में बैठे अपने पक्षकारों के जरिए अशोक तंवर को हरियाणा में पार्टी का संगठन खड़ा करने भी नहीं दिया जिसके चलते अशोक तंवर एक सफल प्रदेश अध्यक्ष के रूप में खुद को साबित नहीं कर पाए।
 2017 में भूपेंद्र हुड्डा ने फिर से खुद को प्रदेश अध्यक्ष बनाने के लिए पुरजोर कोशिश की लेकिन पिछले आधा दर्जन प्रयासों की तरह यह प्रयास भी विफल रहा। हाईकमान ने उनको साफ साफ कह दिया कि भाजपा की गैर जाट राजनीति के चलते किसी जाट नेता को हरियाणा प्रदेश कांग्रेस की कमान नहीं सौंपी जा सकती जिसके चलते उन्होंने अपनी समर्थक विधायक गीता भुक्कल को अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव हाईकमान के पास रखा लेकिन उसे नामंजूर कर दिया गया। भूपेंद्र हुड्डा ने हार नहीं मानी और उन्होंने अपने खासमखास सहयोगी कुलदीप शर्मा को प्रदेश अध्यक्ष बनाने के लिए हाईकमान से फरियाद की। उनका यह तर्क था कि अगर कुलदीप शर्मा को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया तो गैर जाट वोटर कांग्रेस के साथ जुड़ जायेंगे लेकिन पार्टी हाईकमान ने कुलदीप शर्मा की क्षमता की पूरी पड़ताल करने के बाद भूपेंद्र हुड्डा के प्रस्ताव को नामंजूर कर दिया।
 इसके बाद भूपेंद्र हुड्डा ने कुमारी शैलजा को अध्यक्ष पद संभालने के लिए रजामंद करने की कोशिश की लेकिन कुमारी सैलजा ने अध्यक्ष बनने से इंकार कर दिया। लगातार तीसरे साल भूपेंद्र हुड्डा की कोशिश नाकाम हो गई।
 2018 में एक बार फिर भूपेंद्र हुड्डा ने पहले खुद को प्रदेश अध्यक्ष बनवाने के लिए पुरजोर कोशिश की लेकिन राहुल गांधी ने फिर से अशोक तंवर के पक्ष में वीटो कर दिया। अपनी दाल नहीं गलती देख भूपेंद्र हुड्डा ने कुलदीप बिश्नोई को प्रदेश अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव पार्टी हाईकमान के पास भेजा। उसमें यह तर्क दिया गया कि कि प्रदेश में गैर जाट वोटरों पर अभी भी स्वर्गीय भजनलाल का भारी प्रभाव है जिसके चलते कुलदीप बिश्नोई उनको कांग्रेस के साथ लामबंद करने का काम कर सकते हैं। कुलदीप बिश्नोई भी इसी शर्त पर भूपेंद्र हुड्डा के साथ रिश्तों को सुधारते हुए मकर संक्रांति के कार्यक्रम में भूपेंद्र हुड्डा के घर पर गए थे। भूपेंद्र हुड्डा के यह प्रयास सिरे चढने ही वाले थे कि इनेलो और बसपा की गठबंधन ने प्रदेश की राजनीति में नए समीकरणों का ऐलान कर दिया।
अभी तक भाजपा की गैर जाट राजनीति के कारण परेशानी के दौर से गुजर रही कांग्रेस को इनेलो और बसपा के गठबंधन के कारण दलित वोटरों को अपने पाले में रखने की बड़ी मजबूरी का आभास हो गया ।कांग्रेस के लिए नई सियासी मजबूरी यही थी कि अगर वह दलित नेता अशोक तंवर को हटाकर किसी गैर दलित नेता को अध्यक्ष बनाती है तो दलित वोटों के इनेलो और बसपा के पाले में जाने के ऑटोमेटिक हालात बन जाएंगे। इस कारण कुलदीप बिश्नोई को अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव अधर में लटक गया।
अशोक तंवर को अध्यक्ष पद से हटाने के लिए कोई भी कीमत चुकाने के लिए तैयार भूपेंद्र हुड्डा ने इसका तोड़ निकालते हुए हाईकमान के पास अब शैलजा को प्रदेश अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव भेजा है।अशोक तंवर की बढ़ती लोकप्रियता से डरी हुई शैलजा ने भी भूपेंद्र हुड्डा के प्रस्ताव पर हामी भर दी है।
अब अशोक तंवर को हटाने के लिए यही तर्क दिया जा रहा है कि अगर उनकी जगह शैलजा को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया जाए तो प्रदेश कांग्रेस के सभी नेता एकजुट होकर कांग्रेस की मजबूती के लिए काम करने को तैयार हैं। इस मामले में भी कांग्रेस हाईकमान को गुमराह किया जा रहा है क्योंकि रणदीप सुरजेवाला, कैप्टन अजय यादव और किरण चौधरी ने अभी तक इस प्रस्ताव पर अपनी सहमति नहीं दी है।
खरी खरी बात यह है कि अशोक तंवर को हटाने के लिए भूपेंद्र हुड्डा ने अपना अंतिम तीर भी चल दिया है लेकिन इस चाल के कारण कुलदीप बिश्नोई के अध्यक्ष बनने के रास्ते बंद होते नजर आ रहे हैं। 2005 से लेकर अभी तक कुलदीप बिश्नोई लगा लगातार सियासी धोखाधड़ी के शिकार होते रहे हैं । 2018 में भी उनके साथ वही कारनामा दोहराए जाने की आशंका नजर आ रही है ।
भूपेंद्र हुड्डा खेमा जहां शैलजा को अध्यक्ष बनाना चाहता है वही किरण चौधरी को सीएलपी लीडर के पद पर बनाए रखना चाहता है।भूपेंद्र हुड्डा खुद इलेक्शन कंपेन कमेटी के चेयरमैन का पद अपने लिए चाहते हैं ।कुलदीप बिश्नोई व कुलदीप शर्मा को वह कार्यकारी अध्यक्ष बनाने की तिगड़म भिड़ा रहे हैं। इस मामले में वह कुलदीप शर्मा की जगह कैप्टन अजय यादव को भी कार्यकारी अध्यक्ष का पद देने से इनकार नहीं करेंगे।
भूपेंद्र हुड्डा की इस नई सियासी चौपड़ में सिर्फ अशोक तंवर और रणदीप सुरजेवाला को बाहर रखा गया है और उनको सेंटर की राजनीति में पद देने की सिफारिश की गई है।अगर भूपेंद्र हुड्डा का यह गेम प्लान सिरे चढ़ गया तो कुलदीप बिश्नोई के लिए अध्यक्ष बनना मुमकिन नहीं होगा और उनको मजबूरी में सिर्फ कार्यकारी अध्यक्ष का पद लेने को मजबूर होना पड़ेगा । अब यह साफ हो गया है कि प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष दलित नेता ही रहेगा ।
अगर राहुल गांधी ने शैलजा और अशोक तवर की पिछले 4 साल की वर्किंग का ब्यौरा मांगा तो तंवर के ही अध्यक्ष बनने के आसार रहेंगे क्योंकि पिछले 4 साल में जहां अशोक तंवर पार्टी की मजबूती के लिए सड़कों की खाक छानते रहे हैं वही कुमारी शैलजा सिर्फ ड्राइंग रूम की राजनीति करती रही हैं।
अब देखना यह है कि भूपेंद्र हुड्डा के तरकश का यह आखरी तीर अपने लक्ष्य को भेदता है या फिर पिछले 4 साल की तरह नकारा निकलता है। लेकिन यह तय है कि दोनों ही हालात में कुलदीप बिश्नोई के लिए अध्यक्ष पद हासिल करने के दरवाजे बंद नजर आ रहे हैं। कुलदीप बिश्नोई भूपेंद्र हुड्डा की चाल में फंस गए हैं और उनको छोटा पद लेने को मंजूर करने को उन्हें मजबूर होना पड़ेगा।

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