दलित वोटरों के लिए मारामारी 
सभी पार्टियों ने दलित वोट बैंक पर किया फोकस
कुलदीप श्योराण
चंडीगढ़। क्या यह सही है कि प्रदेश की सभी पार्टियों को दलित वोट बैंक की चिंता सता रही है?
 क्या यह सही है कि सभी पार्टियों को दलित वोट बैंक गेमचेंजर नजर आ रहा है?
 क्या यह सही है कि इनेलो और बसपा के गठबंधन के बाद दलित वोटरों को लेकर कांग्रेस और भाजपा में चिंता का माहौल है?
 क्या यह सही है कि दलित वोटरों का मूड प्रदेश की सत्ता का निर्धारण कर सकता है?
क्या यह सही है कि दलित वोटरों को कोई भी पार्टी अनदेखा नहीं कर सकती है ?
उपरोक्त सभी सवालों का जवाब हां में है।
इस समय प्रदेश में दलित वोट बैंक को अपने पक्ष में करने के लिए सभी राजनीतिक दलों में भीषण मारामारी चल रही है। पिछले कुछ चुनाव में दलित वोटरों को सिर्फ वोट हासिल करने के हिसाब से यूज किया जाता रहा है मगर इस बार प्रदेश के राजनीतिक हालात में उनकी अहमियत अचानक काफी बढ़ गई है दलित वोट बैंक को गेम चेंजर मानते हुए सभी पार्टियां उसे अपने पक्ष में करने के लिए हर मुमकिन कोशिश में जुट गई हैं।
कांग्रेस ने किया लामबंदी का आगाज
दलित वोट बैंक को लामबंद करने की शुरुआत सबसे पहले प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अशोक तंवर ने की अशोक तंवर इस समय प्रदेश कांग्रेस में सक्रिय सबसे बड़े दलित नेता है तमाम बड़े नेताओं के विरोध में खड़े होने के बावजूद उन्होंने कांग्रेस के जनाधार को मजबूत करने के लिए साइकिल यात्रा का आगाज किया उनकी साइकिल यात्रा के दौरान दलित वोटर काफी संख्या में देखने को मिले जिसके चलते यह एहसास हुआ कि दलित वोट बैंक कांग्रेस के साथ
जा रहा है।
इनेलो ने लगाया मास्टर स्ट्रोक
इसके बाद इनेलो ने मार्क्स्स्ट्रोक स्ट्रोक लगाते हुए बसपा के साथ चुनावी गठबंधन करने का ऐलान कर दिया। बसपा भी प्रदेश में दलित वोट बैंक पर असर रखने वाली पार्टी है। इनेलो की कैलकुलेशन यही है कि अगर जाट और दलित वोटर इकट्ठे हो गए तो यह गठबंधन सत्ता का सरताज बन सकता है। यह बात आंकड़ों के हिसाब से भी वजनदार लगती है क्योंकि इनेलो और बसपा का वोट बैंक 30 फ़ीसदी के आंकड़े को होता है और थोड़ा सा पक्ष में माहौल होने पर यह 35% तक जाने की संभावना रखता है। इतना वोटबैंक सत्ता हासिल करने के लिए त्रिकोणीय फाइट में निर्णायक साबित हो सकता है।
 भाजपा में भय का माहौल 
कांग्रेस की कमान दलित नेता अशोक तंवर के हाथ में होने और इनेलो बसपा के गठबंधन के चलते भाजपा में भय का माहौल कायम हो गया है । 2014 के चुनाव में भाजपा को काफी संख्या में दलित वोटरों का समर्थन भी मिला था। भाजपा ने सढोरा, मुलाना, शाहबाद, गुहला चीका, नीलोखेड़ी, इसराना, बावल, पटौदी व बवानीखेड़ा नौ आरक्षित विधानसभा सीटों को जीतकर पहली बार सरकार बनाने में सफलता हासिल की। भाजपा अगली बार भी इस सफलता को दोहराने का अरमान रखती है लेकिन यह तभी संभव हो पाएगा जब दलित वोटबैंक उसके साथ जुड़ा रहेगा। प्रदेश के राजनीतिक हालात इशारा कर रहे हैं कि भाजपा के साथ दलित वोटों का मोहभंग हो रहा है। इसलिए भाजपा ने उनको अपने साथ जोड़ने के लिए विशेष रणनीति को अंजाम देते हुए अपने तमाम बड़े नेताओं को दलितों के घर में भोजन करने का कार्यक्रम बनाया। मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर और दूसरे सभी मंत्रियों ने दलितों के घर भोजन करके भाजपा को दलितों के हितेषी पार्टी दिखाने की कोशिश की। भाजपा यह नहीं चाहती कि दलित वोटर कांग्रेस या इनेलो बसपा गठबंधन के साथ जाएंं और उसकी झोली खाली रह जाए। इसलिए वह दलित वोटरों को अपने पाले में रखने के लिए हर मुमकिन कोशिश करने से पीछे नहीं हटेगी।
इनेलो का है खास गेम प्लान 
 इनेलो ने बसपा के साथ मिलकर दलित वोटरों को अपने पाले में करने के लिए वेरी वेरी स्पेशल प्लानिंग की है। उन्होंने मायावती को प्रधानमंत्री बनाने के नाम पर दलित वोटरों को एकमुश्त अपने पाले में करने का जोरदार हथियार चलाया है। दोनों पार्टियों का मानना है कि अगर मायावती को प्रधानमंत्री बनाने का मुद्दा गरमा गया तो दलित वोटर गठबंधन के साथ भारी संख्या में जुड़ सकते हैं जिसके चलते उनको लोकसभा चुनाव के साथ-साथ विधानसभा चुनाव में भी भारी फायदा हो सकता है।
 कांग्रेस में क्या हैंं हालात
इनेलो बसपा गठबंधन होने के बाद कांग्रेस में हालात बदल गए हैं। अब कांग्रेस किसी भी सूरत में दलित प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर को बदलने का रिस्क नहीं ले सकती क्योंकि कांग्रेस ने अगर अशोक तंवर को बदला तो दलित वोटर इनेलो और बसपा के साथ जुड़कर उसे सत्ता पर काबिज कर देंगे वहीं कांग्रेस फिर से सत्ता से बेदखल रह जाएगी। इसलिए कांग्रेस को हर हाल में दलित नेता को ही प्रदेश अध्यक्ष बनाए रखना मजबूरी हो गई है।
कांग्रेस किसी नेता को CM प्रोजेक्ट तो नहीं करेगी लेकिन वह फिलहाल दलित चेहरे को ही प्रदेश अध्यक्ष बनाए रखने के लिए मजबूर हो गई है। यह सही भी है कि अगर कांग्रेस ने किसी गैर दलित को प्रदेश अध्यक्ष बनाया तो वह उसकी चुनावी संभावनाओं को बिगड़ने का सबसे बड़ा कारण साबित हो सकता है। अशोक तंवर उनको हटाकर दूसरे दलित नेता शैलजा को प्रदेश अध्यक्ष बनाने के लिए हाईकमान से फरियाद कर रहा है। कांग्रेस पहले ही भाजपा की गैर जाट राजनीति का शिकार हो गई थी। ऐसे में इनेलो -बसपा गठबंधन उसके लिए दोहरी मुसीबत बनता हुआ नजर आ रहा है क्योंकि वह इन दोनों ही मामलों में राजनीतिक समीकरणों की अनदेखी नहीं कर सकती है।
भाजपा पर है दोहरी मार 
कांग्रेस का दलित प्रदेश अध्यक्ष होना और इनेलो- बसपा का गठबंधन होना भाजपा के लिए दोहरी मार का कारण बन गया है। भाजपा ने इसमें सरकार में कृष्ण पंवार, डॉक्टर बनवारीलाल और कृष्ण बेदी को मंत्री बनाया हुआ है लेकिन तीनों ही मंत्री दलित वोटरों को लुभाने में नाकाम साबित हुए हैं। इसलिए भाजपा हाईकमान की चिंता बढ़ती जा रही है कि वह किस तरह दलित वोटरों को अपने पाले में बनाए रखें।
 खरी खरी बात यह है कि प्रदेश के सभी दलों के लिए दलित वोटरों को अपने साथ रखना बेहद जरूरी हो गया है। दलित वोटबैंक जिस भी पार्टी या गठबंधन के साथ एकमुश्त होकर जुड़ गया उसका पलड़ा चुनावी जंग में भारी हो जाएगा और वह सत्ता का सबसे प्रबल दावेदार बन जाएगा।
 इस समय भाजपा की सरकार होने के कारण दलितों में उसके प्रति नाराजगी देखने को मिल रही है। उसका फायदा उठाने के लिए जहां कांग्रेस को दलित प्रदेश अध्यक्ष को बनाए रखना होगा, वहीं दूसरी तरफ इनेलो- बसपा गठबंधन को भी मायावती के नाम पर दलितों को अधिक से अधिक अपने साथ जोड़ने का काम अंजाम देखना होगा। दलित वोटबैंक की चिंता में सभी दलों के चुनावी समीकरणों को गहराई तक प्रभावित किया है। इसलिए यह लग रहा है कि दलित वोटबैंक प्रदेश का इस समय सबसे बड़ा गेम चेंजर बन गया है।

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