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हुड्डा और अभय के अरमानों पर गाज

 दोनों के सियासी ख्वाब हो नहीं पा रहे पूरे 
चाहतों पर हाईकमान ने लगाया अड़ंगा
कुलदीप श्योराण
 चंडीगढ़। पूर्व सीएम भूपेंद्र हुड्डा और इनेलो के हालिया कमांडर अभय चौटाला के बीच वैसे तो 36 का आंकड़ा है मगर दोनों की सियासी तकदीर एक जैसी महसूस हो रही है।
 -दोनों ही नेता cm बनने के ख्वाब रखते हैं मगर दोनों के ही अरमानों पर हाईकमान ने अड़ंगा लगा दिया है।-
-दोनों ही नेता अगले चुनाव में CM बनना चाहते हैं मगर दोनों की ही प्लानिंग सिरे नहीं चढ़ पा रही है।
– दोनों खुद को पार्टी में सबसे फेवरेट और सबसे बेहतर विकल्प मानते हैं मगर दोनों का पिछला चुनावी रिकॉर्ड उनके खिलाफ जा रहा है।
आइए दोनों ही नेताओं की सियासी लिखा पढी का आकलन करते हैं:-
क्या हैं दोनों के अरमान ?
पूर्व सीएम भूपेंद्र हुड्डा ने 9 साल तक प्रदेश पर एकछत्र राज किया। वह अभी भी यह अरमान रखते हैं कि अगली बार वह चुनाव में पार्टी की कमान संभालते हुए सत्ता हासिल करें और एक बार फिर CM की कुर्सी पर बैठे। भूपेंद्र हुड्डा वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर को हटाने के लिए 3 साल से लगातार कोशिश कर रहे हैं मगर हाईकमान उनकी फरियादों को लगातार नकार रहा है। भूपेंद्र हुड्डा को यह लगता है कि अगर उनको अध्यक्ष पद हासिल नहीं हुआ तो वह CM की दौड़ से पिछड़ सकते हैं।
भूपेंद्र हुड्डा की तरह अभय चौटाला भी पिछले 4 साल से पार्टी की कमान संभाल रहे हैं। पार्टी के मुखिया ओम प्रकाश चौटाला व बड़े भाई अजय चौटाला के जेल चले जाने के कारण इनेलो पर अभय चौटाला का राज चल रहा है। अभय चौटाला इस सुनहरे मौके को अपने सियासी ख्वाब पूरे करने का गोल्डन चांस मान रहे हैं। वह अगले चुनाव में बसपा के साथ सत्ता हासिल करके CM बनने का ख्वाब रखते हैं। वह भी चाहते हैं कि पार्टी मुखिया ओम प्रकाश चौटाला उनको सीएम प्रत्याशी घोषित कर दें मगर बड़े चौटाला अभी ऐसा करने के मूड में नजर नहीं आते हैं।
क्या है रुकावट ?
भूपेंद्र हुड्डा ने 9 साल के शासन काल के दौरान कांग्रेस हाईकमान में बैठे सभी बड़े-बड़े नेताओं को सैट कर लिया था. रॉबर्ट वढेरा, जनार्दन द्विवेदी, अहमद पटेल, शकील अहमद व कमलनाथ जैसे सभी बड़े कांग्रेसी नेता उन के पक्षधर बन गए थे। इसी कारण 9 साल तक हरियाणा में सिर्फ और सिर्फ भूपेंद्र हुड्डा की तूती ही बोलती रही। वह सरकार और संगठन दोनों में मनमर्जी का राज चलाते रहे। उनकी मर्जी के बगैर प्रदेश कांग्रेस में पत्ता भी नहीं हिलता था। इसी असीमित पावर का उनको घमंड हो गया जिसके चलते उन्होंने राहुल गांधी को भी इग्नोर करने का गलत शॉट खेल दिया। भूपेंद्र हुड्डा को लगता था कि वह कांग्रेस हाईकमान के लिए मजबूरी बन गए हैं क्योंकि उनके बगैर दिल्ली में कांग्रेस बड़ी रैली नहीं कर सकती है। इसलिए उन्होंने अपने ‘गुलाबी गैंग’ के जरिए पार्टी हाईकमान पर कई बार दबाव बनाने का प्रयास किया। इसके अलावा उन्होंने हाईकमान के फरमान को भी मानने से इनकार किया। राज्यसभा चुनाव में उन्होंने स्याही कांड का हिस्सा बनकर एक तरह से बगावती तेवर भी दिखाएं। इन सब कारणों से राहुल गांधी भूपेंद्र हुड्डा से खफा हो गए। राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद राहुल गांधी अब कांग्रेस के सर्वेसर्वा बन गए हैं और उनको राजी किए बगैर भूपेंद्र हुड्डा न तो प्रदेश अध्यक्ष बन सकते हैं और ना ही cm पद हासिल कर सकते हैं। भूपेंद्र हुड्डा ने पिछले दिनों अशोक गहलोत की मध्यस्थता के जरिए राहुल गांधी के साथ रिश्तो में जमी बर्फ को पिंंघलाने का प्रयास किया।
 भूपेंद्र हुड्डा की तरह अभय चौटाला भी निरंतर पार्टी को अपने हिसाब से चलाने के लिए रणनीति बनाते आए हैं। उन्होंने अपने खासमखास लोगों को जहां प्रमोट करने का काम किया है वही उनको नापसंद करने वाले लोगों को हाशिए की तरफ धकेलने का काम किया। अभय चौटाला को शायद यह लगता है कि पिता और भाई की गैरमौजूदगी में वे पार्टी पर प्रभुत्व जमा सकते हैं और CM बनने के बाद वह स्वर्गीय देवीलाल की राजनीतिक विरासत के अगले उत्तराधिकारी बन सकते हैं। इसी कारण वह अंदरखाते खुद को CM पद का प्रत्याशी घोषित कराने का प्रयास कर रहे हैं। इसी कड़ी में 18 मई को कुरुक्षेत्र में आयोजित जेल भरो आंदोलन के दौरान हुई सभा में पिहोवा के विधायक जसविंदर संधू ने अभय चौटाला को CM प्रत्याशी घोषित करने की मांग कर डाली। इस मांग के पीछे अभय चौटाला की हसरत बताई जा रही है।
 क्या है हालात?
 पूर्व सीएम भूपेंद्र हुड्डा लाख कोशिशों के बावजूद न तो अशोक तंवर को प्रदेश अध्यक्ष पद से अध्यक्ष पद से हटाने में सफल हो पा रहे हैं और ना ही खुद अध्यक्ष पद बन पा रहे हैं। भाजपा की गैर जाट राजनीति के कारण हाईकमान के पास किसी जाट नेता को अध्यक्ष नहीं बनाने का मजबूत बहाना मिल गया है।  इनेलो और बसपा की गठबंधन के कारण कांग्रेस हाईकमान अब दलित चेहरे को ही अध्यक्ष पद बनाए रखने को मजबूर लग रहा है। इसी मजबूरी को भांंपते हुए भूपेंद्र हुड्डा अंतिम प्रयास के तहत कुमारी शैलजा को अशोक तवर की जगह प्रदेश अध्यक्ष बनाने के लिए पूरी ताकत झौंके हुए हैं।
अभय चौटाला भी खुद को सीएम प्रत्याशी घोषित करने के लिए पिता ओमप्रकाश चौटाला को मनाने में नाकाम रहे हैं। ओम प्रकाश चौटाला अभी पार्टी कमान अपने हाथ में रखना चाहते हैं और अपने गणित और प्रदेश के सियासी हालात के अनुसार अगला उत्तराधिकारी घोषित करना चाहते हैं। वह समय से पहले पत्ते खोलने को राजी नहीं हैं। अभय चौटाला को अभी तक CM प्रत्याशी घोषित नहीं करना इस बात का प्रतीक है कि ओम प्रकाश चौटाला ने CM बनाने के लिए उनको अभी तक हरी झंडी नहीं दिखाई है।
दोनों में क्या है फर्क ?
भूपेंद्र हुड्डा के साथ वर्तमान व पूर्व विधायकों, वर्तमान व पूर्व सांसदों, पूर्व चेयरमैन व पूर्व पार्टी पदाधिकारियों की पूरी फौज खड़ी हुई है। उनको प्रदेश कांग्रेस के लगभग 200 नेताओं का समर्थन हासिल है लेकिन इसके बावजूद भी वह राहुल गांधी से हरी झंडी हासिल करने में नाकाम रहे हैं।
 दूसरी तरफ अभय चौटाला के साथ पार्टी के चंद नेता ही नजर आते हैं। इसके अलावा पार्टी का 90 फ़ीसदी से अधिक कैडर भी उनकी बजाए अजय चौटाला के परिवार के साथ जुड़ा नजर आता है। पार्टी की कमान अभय के हाथ में होने के कारण कार्यक्रमों में सभी पार्टी नेताओं का उनके साथ खड़ा होना जरूरी और मजबूरी दोनों हैं लेकिन पार्टी के मझले व छोटे नेताओं व वर्करों में अभय चौटाला अपने लिए लगाव पैदा करने में नाकाम रहे हैं। यही कारण है कि ओम प्रकाश चौटाला अभय चौटाला को CM प्रत्याशी घोषित नहीं कर रहे हैंं।
भूपेंद्र हुड्डा की छवि जनता में नकारात्मक नहीं है और उनका प्रभाव साथी नेताओं के कारण पूरे प्रदेश में नजर भी आता है लेकिन उनको भाजपा की गैर जाट राजनीति व राहुल गांधी की नापसंदगी की मार झेलनी पड़ रही है।
 दूसरी तरफ अभय चौटाला अभी तक जनता के चहेते नेता बनने में नाकाम रहे हैं लेकिन उनको यह लगता है कि बसपा के साथ गठबंधन करके वह पार्टी के पक्के वोटबैंक के बलबूते पर सरकार बनाने का लक्ष्य हासिल कर सकते हैं।
खरी खरी बात यह है कि भूपेंद्र हुड्डा और अभय चौटाला दोनों के सियासी अरमानों की गाड़ी पार्टी हाईकमान की लाल झंडी के कारण मंजिल की तरफ रवाना नहीं हो पा रही है।  हुड्डा को जहां राहुल गांधी का विरोध करना और उनको अनदेखा करने का काम महंगा पड़ रहा है वहीं दूसरी तरफ अभय चौटाला के लिए बड़े भाई अजय चौटाला के बेटों सांसद दुष्यंत चौटाला वह दिग्विजय चौटाला की कड़ी मेहनत रास्ते का रोड़ा बन गई है।
 राहुल गांधी हरियाणा में उस नेता को पार्टी की कमान सौंपना चाहते हैं जो उनके परिवार के प्रति समर्पित हो और पार्टी को सत्ता में लाने का दमखम रखता हो। उस नेता को हरगिज पार्टी की चौधर नहीं सौंपेंगे जो जो उनको आंख दिखाने की हिमाकत कर सकता हो। इसी तरह ओम प्रकाश चौटाला भी यह जायजा ले रहे हैं कि पार्टी को सत्ता में लाने का काम कौन कर सकता है। शायद उनको लग रहा है कि अभय चौटाला को CM प्रत्याशी घोषित करने से पार्टी की चुनावी संभावनाओं को नुकसान हो सकता है। इसीलिए वे हरगिज़ नहीं चाहते कि अभय को CM प्रत्याशी घोषित करके पार्टी को सत्ता की दौड़ से बाहर कर दें।
भूपेंद्र हुड्डा 200 नेताओं की फौज साथ होने के बावजूद राहुल गांधी से चौधर का गिफ्ट हासिल करने में नाकाम हो रहे हैं तो इसका कारण यही है कि वह खुद को हाईकमान से ऊपर समझने लगे थे और अब हाईकमान उनको उनकी औकात बता रहा है।
दूसरी तरफ अभय चौटाला भी कहीं ना कहीं सत्ता के चक्कर में परिवार के दूसरे सदस्यों को इग्नोर करने की बड़ी गलती कर बैठे जिसके चलते पार्टी व परिवार के मुखिया ओम प्रकाश चौटाला उनके हाथ में चुनाव की कमान देने को तैयार नहीं है।
 भूपेंद्र हुड्डा को तो मजबूरी में शैलजा को आगे करना पड़ रहा है लेकिन अभय चौटाला के पास ऐसा कोई विकल्प नहीं है। ऐसे में देखना यह है कि इन दोनों महारथियों में से किसे राजयोग मिलता है और किसे सत्ता से वंचित रहना पड़ेगा।

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