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Guest Teachers from Haryana ।। कच्चे कर्मचारियों का दर्द

गेस्ट टीचर्स की खरी-खरी

फरवरी 2014 में दिल्ली के जंतर-मंतर पर हरियाणा के गेस्ट टीचर्स का बड़ा जमावड़ा हुआ। लंबे धरने प्रदर्शन के बाद हुड्डा सरकार ने तो सुनी नहीं लेकिन विपक्षी बीजेपी एक उम्मीद के तौर पर गेस्ट टीचर्स के सामने आई। उस वक़्त हरियाणा बीजेपी के अध्यक्ष रामबिलास शर्मा जंतर-मंतर पर पहुंचे और बड़ा ऐलान किया या यूं कहें कि बड़ा झूठ बोला। ये झूठ नहीं होता तो ये गेस्ट टीचर्स आज स्कूलों में होते। सड़कों पर नहीं। ये बच्चों का भविष्य बना रहे होते। ख़ुद के भविष्य को नहीं बचा रहे होते। अगर ये झूठ नहीं होता तो बीजेपी की सरकार बनते ही इन्हें पहली कलम से पक्का हो जाना चाहिए था। लेकिन मालूम नहीं क्या हुआ? बीजेपी की पहली कलम चल नहीं पाई या अब तक कलम मिल नहीं पाई?
अब एक बार फिर गेस्ट टीचर्स आंदोलन की राह पर हैं। पहली नवंबर से गेस्ट टीचर्स सभी मंत्रियों के इलाक़ों में क्रमिक अनशन कर रहे हैं।
बरसों के संघर्ष और फरेब से गुस्साए गेस्ट टीचर्स अब सरकार की आलोचना नहीं करते बल्कि उसे बद-दुआ देते हैं। वादाख़िलाफ़ी की वजह से शर्मिंदगी का शिकार हो रही महिला टीचर्स निंदा नहीं करती अब सरकार को श्राप देती हैं।
बीजेपी आज ना सिर्फ़ अपना चुनावी वादा भूल गई है। बल्कि उसने तो यहां तक कहना शुरू कर दिया है कि हरियाणा में सरप्लस गेस्ट टीचर्स हैं। सवाल ये है कि अगर हरियाणा में टीचर्स सरप्लस हैं तो आख़िर क्यों सरकारी स्कूल ख़ाली पड़े हैं। क्यों एक टीचर के भरोसे 5 क्लास और चपरासी के भरोसे पूरे-पूरे स्कूल चल रहे हैं।
पिछले साल ही सरकार ने 3581 गेस्ट टीचर्स को सरप्लस बताकर नौकरी से बाहर कर दिया था। लेकिन ये इन लोगों का संघर्ष और एकजुटता ही है कि सरकार को अपना फ़ैसला वापिस लेते हुए उन्हें नौकरी पर रखना पड़ा। लेकिन अब जेबीटी की 9 हज़ार से ज़्यादा पक्की भर्ती होते ही 1200 टीचर्स को फिर फालतू बताकर उनका रोज़गार छीन लिया गया। उन्हें भी अब वापिल लेना पड़ा। अब बच बचाकर क़रीब 13 हज़ार गेस्ट टीचर्स रह गए हैं।
बीजेपी सरकार ने तो इन गेस्ट टीचर्स के साथ वादाख़िलाफ़ी की है। लेकिन हुड्डा सरकार ने तो इन्हें वो घाव दिया था, जो कभी नहीं भर सकता। शायद ये देश की पहली और काश इकलौती ऐसी घटना हो जब पुलिस की गोली ने किसी महिला टीचर को अपना शिकार बनाया हो। टीचर्स पर ये क़हर हुड्डा सरकार के दौरान टूटा था। जान की क़ुर्बानी लेकर भी अधूरी पड़ी इस मांग को पूरा करने का वादा बीजेपी ने किया। बदले में गेस्ट टीचर्स ने चुनाव में बीजेपी के लिए जमकर प्रचार किया।
अब बीजेपी कह रही है कि मामला कोर्ट में है। हालांकि, ऐसा नहीं है कि बीजेपी को सरकार में आने के बाद मालूम पड़ा हो कि गेस्ट टीचर्स का मामला कोर्ट में है। वो बख़ूबी जानती थी। चुनाव थे तो तब उसे ना कोर्ट का ख़्याल आया और ना क़ानून का ध्यान। गेस्ट टीचर्स कहते हैं कि अगर सरकार कोर्ट के आदेश की पालना करने का इतना ही दम्भ भरती है तो वो क्यों नहीं सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश को लागू करती जो कहता है कि समान काम के लिए समान वेतन दिया जाए।
गेस्ट टीचर्स का ये भी कहना है कि जब साथ लगते राज्य दिल्ली की सरकार गेस्ट टीचर्स को पक्का करने का ऐलान कर सकती है तो हरियाणा सरकार क्यों नहीं। जैसी कोशिश केजरीवाल कर रहे हैं, वैसी कोशिश खट्टर क्यों नहीं कर रहे।
कोर्ट में मामला होने की दलील देने वाली बीजेपी सरकार अपने घोषणा यानी संकल्प पत्र में शामिल मांग को लेकर गंभीर है, ये भी अपने आप में एक सवाल है। प्रदेश के मुखिया को ये तक नहीं पता कि प्रदेश में कुल गेस्ट टीचर्स कितने हैं। कुल छोड़िए, उन्हें आसपास का आंकड़ा भी नहीं पता है। उनके मुताबिक तो महज़ 6 हज़ार गेस्ट टीचर्स हरियाणा में काम कर रहे हैं। जबकि ये आंकड़ा 13 हज़ार है।

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