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खरी खरी न्यूज़ एक्सक्लूसिव – अशोक तंवर को रोकने के लिए मजबूरी ने मिटाई हुड्डा व कुलदीप की दूरी

मजबूरी ने मिटाई हुड्डा व कुलदीप की दूरी, अशोक तंवर को रोकने के लिए दोनों का साथ चलना हो गया जरूरी

पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा को कुलदीप बिश्नोई के बीच दोस्ती की खबर प्रदेश की राजनीति का नया मॉडल है।  इन दोनों नेताओं के कारण पिछले 13 साल तक कांग्रेस की राजनीति में कई उतार-चढ़ाव आते रहे।

कुलदीप श्योराण- 2005 में भजनलाल की जगह छीनकर cm बनने वाले भूपेंद्र हुड्डा लगातार कुलदीप बिश्नोई के निशाने पर रहे। दोनों नेताओं के बीच कुत्ते बिल्ली वाला बैर भी रहा।  2009 में भूपेंद्र हुड्डा ने कुलदीप बिश्नोई की हजकां के विधायकों को तोड़कर अपनी सरकार बनाने का काम किया। ऐसा लगता था कि दोनों नेताओं के बीच कभी सामान्य संबंध नहीं हो पाएंगे। लेकिन राजनीति की मजबूरियों ने यह बता दिया है कि कोई भी दूरी स्थाई नहीं होती है। कल लोहड़ी व मकर संक्रांति के कार्यक्रम में भूपेंद्र हुड्डा के घर में कुलदीप बिश्नोई का पत्नी रेणुका के साथ पहुंचना यह साबित कर गया कि राजनीति में दोस्ती और दुश्मनी दोनों ही अस्थाई होती हैं। जरुरतों के हिसाब से दोनों ही बनती और बिगड़ती रहती हैं। कुलदीप बिश्नोई और भूपेंद्र हुड्डा का नया याराना इसका प्रमाण है। वर्तमान प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अशोक तंवर को लेकर भूपेंद्र हुड्डा खुंदक रखते हैं,वहीं दूसरी तरफ कुलदीप बिश्नोई भी उनके कारण खुद को अनसेफ पाते हैं। यही कारण है कि कल तक कट्टर दुश्मन रहे दोनों नेता आज हाथों में हाथ डाले नजर आ रहे हैं।दोनों नेताओं की मजबूरियों ने आपसे दूरियों को मिटाने के लिए बेबस किया।

क्या है भूपेंद्र हुड्डा की मजबूरी?

अशोक तंवर की चाहिए छुट्टी

 भूपेंद्र हुड्डा हर कीमत पर अशोक तंवर को प्रदेश अध्यक्ष के पद से हटाना चाहते हैं।वह सबसे पहले खुद को प्रदेश अध्यक्ष बनाना चाहते हैं।ऐसा नहीं होने पर वह अपने गुट के किसी नेता को प्रधानगी दिलवाना चाहते हैं और ऐसा भी नहीं होने पर वह ऐसे नेता को प्रदेश अध्यक्ष बनाना चाहते हैं जिसके साथ उनके संबंध सही रहें।उनका मकसद सिर्फ एक है कि किसी भी तरह से अशोक तंवर की विदाई प्रदेश अध्यक्ष पद से हो सके। भूपेंद्र हुड्डा को लगता है कि अशोक तंवर उनकी राह का बड़ा रोड़ा है और उसके हटे बगैर कांग्रेस में फिर से अपना दबदबा नहीं बना पाएंगे।

खेमे में सेंधमारी की आशंका

भूपेंद्र हुड्डा को यह लगता है कि अगर अशोक तवर दोबारा से प्रदेश अध्यक्ष बन गए तो उनके साथ खड़े पार्टी नेताओं में सेंध लगने से इनकार नहीं किया जा सकता।

2014 के चुनाव में अशोक तंवर के साथ भूपेंद्र हुड्डा के संबंध सिर्फ इसी वजह से बिगड़े थे कि हुड्डा ने उनकी सिफारिशों को मानने से इनकार कर दिया था। उसमें कांग्रेस हाईकमान में भूपेंद्र हुड्डा की तूती बोलती थी जिसके कारण अशोक तंवर अध्यक्ष होते हुए भी सिर्फ अपने एक ही नेता को विधानसभा का टिकट दिलवा पाए थे। अब हाईकमान में सारे समीकरण पलट चुके हैं।भूपेंद्र हुड्डा को लगता है कि अगर अशोक तंवर प्रदेश अध्यक्ष रहे तो उनके समर्थक नेताओं को टिकट पाने में भारी परेशानी हो सकती है। टिकट कटने के डर से हुड्डा खेमे में नजर आ रहे काफी नेता तंवर की शरण में भी जा सकते हैं।

 फिर से सीएम बनने के लिए भूपेंद्र हुड्डा के लिए यह जरूरी है कि उनके समर्थक नेता अधिक से अधिक विधायक बन कर आएं। यह तब होगा जब प्रदेश अध्यक्ष पद पर उनके पक्ष का नेता विराजमान होगा।

 अशोक तंवर के साथ हुड्डा की दूरी इतनी बढ़ चुकी है कि समझौते के दूर दूर तक आसार नहीं हैं। वह यह उम्मीद नहीं कर सकते कि तंवर उनके कहे अनुसार टिकट देने का काम करेंगे।

राहुल गांधी की नापसंदगी पड़ रही भारी

भूपेंद्र हुड्डा सोनिया गांधी के दरबार में तो फुल दबदबा रखते थे मगर राहुल गांधी की चौखट पर उनकी पैरवी करने वाले नेता नहीं बैठे हैं।

राहुल गांधी की खाट यात्रा के समापन समारोह में हुई अशोक तंवर के साथ मारपीट, राज्यसभा चुनाव में हुड्डा खेमे के विधायकों द्वारा स्याही प्रकरण में शामिल होना और पार्टी की रैलियों में गुलाबी पगड़ियों का शक्ति प्रदर्शन भूपेंद्र हुड्डा के लिए अब परेशानी का सबब बन गया है। हाईकमान की पहली पसंद नहीं होने के कारण भूपेंद्र हुड्डा को यह लग रहा है कि राहुल गांधी की अगुवाई में अशोक तंवर उन पर भारी पड़ सकते हैं।

इसलिए वे गैर जाट प्रदेश अध्यक्ष के लिए कुमारी शैलजा या कुलदीप बिश्नोई के नाम पर सहमत हो सकते हैं।यही कारण है कि उन्होंने कुलदीप बिश्नोई के साथ बेहतर संबंध बनाने के लिए देरी नहीं की।

खरी खरी बात यह है कि भूपेंद्र हुड्डा प्रदेश की सियासत में आज उस दौर से गुजर रहे हैं जहां उनको एक तरफ अशोक को निपटाना है,वहीं दूसरी ओर खुद के खुद को सीएम बनाने के लिए गुंजाइश बचा कर रखनी है।

सत्ता की ताजपोशी के लिए यह जरूरी है कि वह उस नेता के साथ आगे बढ़ें जो उनकी राह में रोड़ा अटकाने की बजाय मिल कर चलने की संभावना रखता हो। कुलदीप बिश्नोई में से भूपेंद्र हुड्डा को कोई खतरा नजर नहीं आता है जिसके कारण उन्होंने कुलदीप बिश्नोई को साथ लेकर चलना बेहतर समझा।

क्या है कुलदीप बिश्नोई की मजबूरी?

2005 में भूपेंद्र हुड्डा के हाथों सत्ता की जंग हारने वाले कुलदीप बिश्नोई 13 साल बाद हालात के हिसाब से राजनीति करते हुए नजर आ रहे हैं। कल तक जो भूपेंद्र हुड्डा उनको सबसे बड़े दुश्मन नजर आते थे, आज वही भूपेंद्र हुड्डा उनके लिए समर्थक नजर आते हैं। 13 साल के संघर्ष में शायद कुलदीप बिश्नोई को यह सिखा दिया है कि सियासत की राह में जरूरत के हिसाब से राजनीति और रणनीति बनाना सबसे बेहतर होता है।

हुड्डा से तालमेल बेहद जरूरी

कुलदीप बिश्नोई इस समय कांग्रेस में उस जगह बैठे हैं जहां उनके लिए अपने बलबूते पर ज्यादा गुंजाइश नजर नहीं आती है। सिर्फ राहुल गांधी ही उनको बैकसीट से फ्रंट ड्राइविंग सीट पर बैठाने का फैसला ले सकते हैं लेकिन इसके लिए उनका नाम का प्रपोजल देने वाले नेताओं की कमी उनको खटकती है । ऐसे में अगर भूपेंद्र हुड्डा प्रदेश अध्यक्ष बनने के लिए कुलदीप बिश्नोई का नाम आगे करते हैं तो समीकरणों के हिसाब से वह अशोक तंवर पर भारी पड़ेंगे। तंवर को प्रधानगी से बेदखल करने पर ही भूपेंद्र हुड्डा और कुलदीप बिश्नोई दोनों के साझा अरमान पूरे होने के आसार बनते हैं।

गैर जाट राजनीति पर राज करने की मंशा

पिता भजनलाल की तरह कुलदीप बिश्नोई भी प्रदेश की राजनीति के शिखर पर राज करना चाहते हैं। स्वर्गीय भजनलाल प्रदेश की गैर जाट राजनीति के सबसे बड़े चेहरे रहे हैं। कुलदीप बिश्नोई भी चाहते हैं कि किसी तरह से परिवार की उसी मजबूत हैसियत को दोबारा से खड़ा किया जाए। उसके लिए जरूरी है कि वह सबसे पहले प्रदेश अध्यक्ष का पद हासिल करें और फिर अपने साथी नेताओं को अपग्रेड करते हुए खुद की मजबूत टीम खड़ी करने के काम को अंजाम दें।

इस समय प्रदेश की गैर जाट राजनीति में सिर्फ अशोक तवर ही सक्रिय नजर आते हैं। कुमारी शैलजा और कैप्टन अजय यादव सिर्फ अपने इलाकों मैं ही सक्रिय नजर आते हैं। राहुल गांधी के कैंप से जुड़े होने के कारण अशोक तंवर खुद की दोबारा ताजपोशी के लिए पूरे जोड़-तोड़ कर रहे हैं। ऐसे में उनको हटाने के लिए कुलदीप बिश्नोई को भूपेंद्र हुड्डा जैसे मजबूत सहारे की जरूरत साफ नजर आती है।इसीलिए भूपेंद्र हुड्डा के साथ दोस्ती करना उनके लिए पूरी तरह से फायदेमंद साबित हो सकता है।

राजनीतिक कैरियर निर्णायक मोड़ पर

कुलदीप विश्नोई का राजनीतिक करियर इस समय निर्णायक मोड़ पर खड़ा है।

अगर वह अगले चुनाव में सीएम पद की दावेदारी दिखाने में सफल रहे तो फतेहाबाद, हिसार व भिवानी जिलों में उनके समर्थक कांग्रेस को एक दर्जन सीटें दिलाने का काम कर सकते हैं।

प्रदेश कांग्रेस में इस समय जहां भूपेंद्र हुड्डा पार्टी को अपने बलबूते पर डेढ दर्जन सीट जिताने का दम रखते हैं,वही कुलदीप बिश्नोई को भी आगे करने से कांग्रेस एक दर्जन सीटें हासिल कर सकती है। ऐसे में इन दोनों नेताओं का हाथ मिलाना कांग्रेस के लिए 30 सीटों का जुगाड़ करता है जो सत्ता की गारंटी साबित हो सकता है।

खरी खरी बात यह है कि कुलदीप बिश्नोई इस समय किसी भी तरह का रिस्क लेने के मूड में नहीं है। इसीलिए उन्होंने सॉफ्ट राजनीति करने का जो फैसला लिया है उसे समझदारी भरा डिसीजन ही कहा जाएगा। कुलदीप बिश्नोई के लिए यह जरूरी है कि वह प्रदेश कांग्रेस में वह बड़ा मुकाम हासिल करे जो उनकी राजनीतिक ख्वाइशों को पूरा करने की गुंजाइश रखता है। भूपेंद्र हुड्डा के साथ मिलकर चलने से कुलदीप बिश्नोई को किसी तरह का नुकसान नहीं है बल्कि बड़ा फायदा ही हो सकता है।

अशोक तवर जहां भूपेंद्र हुड्डा के लिए सबसे बड़ी सिरदर्दी है वहीं कुलदीप बिश्नोई के लिए भी गैर जाट राजनीति करने की राह का रोड़ा है। दोनों नेता अगर मिल कर चलते हैं तो वह उन दोनों के अलावा कांग्रेस के लिए भी फायदेमंद साबित हो सकता है। दोनों नेताओं की ताजी दोस्ती प्रदेश कांग्रेस की नई मिसाल कही जाएगी।

इस मजबूरी की दोस्ती का अंजाम क्या होगा यह तो अभी कोई नहीं बता सकता मगर यह जुगलबंदी अशोक तंवर के लिए खतरे का घंटा बजाने का काम जरूर करती नजर आ रही है।

अब देखना यह है कि अशोक तंवर किस तरह से इस जोड़ी से खुद को बचा पाने में सफल हो पाते हैं। फिलहाल तो यह कहा जा सकता है कि भूपेंद्र हुड्डा और कुलदीप बिश्नोई की राजनीतिक मजबूरियों ने उनको हाथ मिलाकर साथ चलने के लिए मजबूर कर दिया है।

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