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भाजपा से भगदड़ का आगाज

 

बजरंग दास गर्ग ने कांग्रेस में की वापसी
कुलदीप श्योराण
 चंडीगढ़। क्या यह सही है कि भाजपा से नेताओं का मोहभंग होने लगा है?
– क्या यह सही है कि दूसरे दलों से भाजपा में आए नेताओं का दम घुट रहा है?
– क्या यह सही है कि दूसरे दिनों से आए नेताओं को भाजपा की सत्ता में मजा नहीं आ रहा है?
– क्या यह सही है कि भाजपा बाहरी नेताओं को संतुष्ट करने में नाकाम रही है?
– क्या यह सही है कि भाजपा की सत्ता में दोबारा वापसी को लेकर नेताओं में संदेह है ?
-क्या यह सही है कि भाजपा से कई नेता पलायन करने की सोच रहे हैं?
 उपरोक्त सभी सवालों का जवाब हां में है।
 प्रदेश के सबसे बड़े व्यापारी नेताओं में शामिल बजरंग दास गर्ग ने आज भाजपा छोड़कर कांग्रेस में वापसी का ऐलान कर दिया। पूर्व केंद्रीय मंत्री कुमारी शैलजा की मौजूदगी में उन्होंने भाजपा छोड़कर कांग्रेस में जाने का ऐलान किया। भाजपा में आने से पहले भी बजरंग दास गर्ग कांग्रेस में सक्रिय थे। उनको हुड्डा सरकार में चेयरमैन बनाया गया था। बजरंग दास गर्ग 2014 के चुनाव से पहले भाजपा में शामिल हुए थे।
 बजरंग दास गर्ग उन चंद नेताओं में शामिल हैं जो सत्ता की बदलती हवा को सबसे पहले पहचानते हैं।
– जब वह कांग्रेस में थे तो भूपेंद्र हुड्डा के खासमखास हुआ करते थे।
– जब कांग्रेस की सत्ता से बेदखल का आभास हुआ तो वह भाजपा में पाला बदल गए।
– एक बार फिर वे भाजपा से कांग्रेस में वापसी कर गए हैं तो इसका अर्थ यही है कि उनको कांग्रेस की सत्ता में वापसी के आसार लग रहे हैं।
 आखिर क्या कारण है कि भाजपा में दूसरे दलों से आए नेताओं को घुटन महसूस हो रही है और उनको भाजपा में शामिल होने के अपने फैसले पर पछतावा हो रहा है। दूसरे दलों से भाजपा में आए कई बड़े नेता भाजपा से पलायन करने का मन बना रहे हैं और आगामी चुनाव से पहले कई बड़े नेता भाजपा छोड़ सकते हैं। अगर ऐसा हुआ तो भाजपा की सत्ता में वापसी बेहद मुश्किल हो जाएगी और जनता में यही संदेश जाएगा कि भाजपा कमजोर हो रही है।
 यह सही भी है कि भाजपा ने तो उधार के नेताओं को एडजस्ट करने में सफल रही और ना ही उधार के जनाधार को पक्का करने में उसको अभी तक कामयाबी मिली है। अगर इसी तरह भाजपा नेताओं का अपनी सरकार से मोह भंग होता रहा तो वह प्रदेश में सत्ता के बदलाव का साफ संकेत होगा।
 खरी खरी बात यह है कि प्रदेश भाजपा सरकार नेताओं और वर्करों को सत्ता में भागीदारी देने में नाकाम रही है। बजरंग दास गर्ग प्रदेश के व्यापारी वर्ग में बड़ी पकड़ रखते हैं। उनको साढे 3 साल के दौरान कोई बड़ी जिम्मेदारी देने की बजाय अनदेखा करने का काम किया गया। इस कारण उन्होंने भाजपा को बाय-बाय करने में ही बेहतरी लगी।
 बजरंग दास गर्ग जैसे नेताओं की अनदेखी इस बात का प्रतीक है कि भाजपा बाहरी नेताओं को अपना बनाने में नाकाम रही है। इससे पहले पूर्व सांसद जितेंद्र मलिक भी भाजपा को अलविदा कह चुके हैं। इनके अलावा केंद्रीय मंत्री राव इंद्रजीत,भिवानी महेंद्रगढ़ के सांसद धर्मवीर और सोनीपत के सांसद रमेश कौशिक भी उन नेताओं की सूची में शामिल हैं जो अपने आप को भाजपा में खुश महसूस नहीं कर रहे हैं।उनके समर्थक दे उनसे अगले चुनाव से पहले सही फैसला लेने की का आग्रह कर रहे हैं।अगर इसी तरह भाजपा को लेकर नेताओं में नाराजगी का आलम रहा तो वह उसके आशीष ख्वाबों को तार-तार कर सकता है।

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